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कहाँ गायब हैं मोदी-नीतीश को जीत दिलाने वाले प्रशांत किशोर? 'बात बिहार की' शुरू कर सूबे की सियासत से खुद हुए लापता

बिहार (Bihar) विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है. लेकिन डिजिटली अभियान ‘बात बिहार की’ शुरू कर चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) सूबे की सियासत से खुद लापता हो गए है. जनता दल (यूनाइटेड) यानि जेडीयू के पूर्व उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर को काफी दिनों से किसी भी राजनीतिक एक्टिविटी में हिस्सा लेते नहीं देखा गया है.

कहाँ गायब हैं मोदी-नीतीश को जीत दिलाने वाले प्रशांत किशोर? बात बिहार की शुरू कर सूबे की सियासत से खुद हुए लापता

Desk EditorBy : Desk Editor

  |  28 Sep 2020 10:51 AM GMT

पटना: बिहार (Bihar) विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है. लेकिन डिजिटली अभियान 'बात बिहार की' शुरू कर चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) सूबे की सियासत से खुद लापता हो गए है. जनता दल (यूनाइटेड) यानि जेडीयू के पूर्व उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर को काफी दिनों से किसी भी राजनीतिक एक्टिविटी में हिस्सा लेते नहीं देखा गया है. कभी बिहार के मुख्यमंत्री की गद्दी तक नीतीश कुमार को पहुँचाने वाले प्रशांत किशोर अबकी बार चुनाव से ठीक पहले निष्क्रिय नजर आ रहे है. जिस वजह से अटकलों का बाजार गरमा गया है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पूर्व जेडीयू नेता प्रशांत किशोर करीब पांच महीनों से राजनीति में सक्रीय नहीं है. प्रशांत किशोर ने सार्वजनिक ऐलान किया था कि वे बिहार को अगले 10 साल में देश के अग्रणी राज्य में ले जाने वाला प्लान लेकर आए हैं. हालांकि इस घोषणा के कुछ हफ्तों बाद से वह खुद ही गायब हो गए है. दावा किया जा रहा है कि 'बात बिहार की' अभियान के जरिये बिहार में एक नया और अनूठा प्रयोग किया जा रहा हैं, जिससे बिहार में एक नई राजनीति की शुरुआत की जा सके.

राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर की कंपनी आईपैक (इंडियन पोलिटिकल एक्शन कमेटी) का काम जारी है. ऐसे में कयास लगाये जा रहे है कि प्रशांत किशोर फिर से चुनावी रणनीतिकार के अपने पुराने पेशे में लौटने का मन बना चुके है. बीते जुलाई महीने में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने प्रशांत किशोर के इनपुट के आधार पर पार्टी में बड़ा फेरबदल किया गया था.

टीएमसी के एक वरिष्ठ तृणमूल नेता ने कहा था कि प्रशांत किशोर और उनकी टीम आई-पीएसी के इनपुट ने इस फेरबदल में अहम भूमिका निभायी है. हालांकि ममता बनर्जी का निर्णय सर्वोच्च है. लेकिन किशोर और उनकी टीम ने इस संबंध में बनर्जी की आंख-कान की तरह काम किया. यह कदम पश्चिम बंगाल में 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए उठाया गया.

उल्लेखनीय है कि 2015 विधानसभा चुनाव में जेडीयू और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के महागठबंधन के चुनाव अभियान में प्रशांत किशोर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और महागठबंधन को जीत मिली थी. जिसके बाद किशोर दो साल पहले जेडीयू में शामिल हुए. हालांकि पार्टी में आने के कुछ हफ्तों के बाद ही नीतीश कुमार ने उन्हें जेडीयू का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था. हालांकि, इस साल अनुशासनहीनता को लेकर उन्हें जेडीयू से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था.

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