मोना सिंह का बॉलीवुड पर तीखा हमला: उम्र को लेकर दोहरे मापदंडों पर उठाए सवाल, ‘कोहरा 2’ में निभाएंगी दमदार पुलिस अफसर की भूमिका

अभिनेत्री मोना सिंह ने भारतीय फिल्म और मनोरंजन जगत में उम्र को लेकर अपनाए जाने वाले दोहरे मापदंडों पर खुलकर नाराज़गी जाहिर की है। उन्होंने सवाल उठाया है कि जब पुरुष कलाकार उम्र बढ़ने के बावजूद बड़े पर्दे और ओटीटी पर रोमांटिक हीरो की भूमिकाएं निभाते रहते हैं, तो महिला कलाकारों को एक तय उम्र के बाद ऐसे किरदारों से क्यों दूर कर दिया जाता है। मोना सिंह का कहना है कि यह सोच न केवल असमान है, बल्कि महिला कलाकारों की प्रतिभा और अनुभव को भी सीमित दायरे में बांध देती है।
हाल ही में एक बातचीत के दौरान अभिनेत्री ने इंडस्ट्री के इस रवैये को लेकर बेबाक राय रखी। उन्होंने कहा कि भारतीय सिनेमा में आज भी उम्र को महिलाओं के लिए एक बाधा के रूप में देखा जाता है, जबकि पुरुष अभिनेताओं को इस कसौटी पर नहीं कसा जाता। मोना के अनुसार, रोमांटिक फिल्मों में अक्सर काफी उम्रदराज़ पुरुष कलाकारों को युवा अभिनेत्रियों के साथ कास्ट किया जाता है, लेकिन जब महिला कलाकारों की उम्र बढ़ती है तो उन्हें मां, बहन या सीमित सपोर्टिंग किरदारों तक सिमटा दिया जाता है।
इन बयानों के साथ ही मोना सिंह अपने आगामी प्रोजेक्ट नेटफ्लिक्स सीरीज ‘कोहरा सीजन 2’ को लेकर भी चर्चा में हैं। इस सीरीज में वह एक सशक्त और जटिल पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाती नजर आएंगी। उनका किरदार एक महिला की रहस्यमयी हत्या की जांच करता है, लेकिन इस पेशेवर चुनौती के साथ-साथ वह निजी जीवन की गहरी पीड़ा और भावनात्मक संघर्ष से भी जूझ रही होती है। यह भूमिका उनके अब तक के करियर की सबसे गंभीर और परतदार भूमिकाओं में से एक मानी जा रही है।
मोना ने बताया कि ‘कोहरा’ का दूसरा सीजन सिर्फ एक क्राइम थ्रिलर नहीं है, बल्कि यह इंसानी भावनाओं, मानसिक आघात और नैतिक दुविधाओं को भी गहराई से दर्शाता है। पुलिस अधिकारी की वर्दी के पीछे छिपी एक संवेदनशील महिला की कहानी इस सीजन की खास पहचान होगी। उन्होंने कहा कि ऐसे मजबूत किरदार ही आज महिला कलाकारों को नई पहचान और आत्मविश्वास देते हैं।
अभिनेत्री का मानना है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने महिलाओं के लिए बेहतर और वास्तविक किरदारों के दरवाजे खोले हैं, जहां उम्र नहीं बल्कि अभिनय क्षमता को प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि मुख्यधारा सिनेमा को अब भी इस सोच से बाहर निकलने की जरूरत है, ताकि कलाकारों को उनकी उम्र नहीं बल्कि उनके हुनर के आधार पर अवसर मिल सकें।
मोना सिंह की यह टिप्पणी न केवल फिल्म इंडस्ट्री में चल रही बहस को फिर से तेज करती है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या भारतीय सिनेमा वास्तव में समानता की ओर बढ़ रहा है या अब भी पुराने पैमानों में उलझा हुआ है।
